रौताभागी वंश वंशावली
रौताभागी वंश [प्रथम संस्करण]
अनादीकालसे बसोबास कैरएल थारु जातीके मनुष्य देवाइ माइझक अधुनसे लगभग ५०० वर्ष पूर्व जीवन निर्वाहके पद्धती ग्वालवाल अर्थात गाई, भैंसी पालन कैरके जीवन गुजारा करे वही जीवन गुजारा के क्रममे गाई, भैंसीके पालन क्रममे हालके उदयपुर जिलाके उत्तरी बेल्टमे अवस्थित रौता पोखरिबे आसपास बसोबास करे लागल और वही जगहमे दुई सुपुत्र भ्याल जेठ के नाम विष्णी और छोटके नाम किष्णी जेठ सुपुत्रके विवाह पश्चात देवाई माइझक मृत्यु भ्याल, देवाई माइझके मृत्यु पश्चात उ परिवारमे तीन सदस्य रहे, विष्णी, किष्णी और विष्णी के परिवार (श्रीमती) परिवारमे किष्णी कुछ नदान (छोट) रहे त घर व्यवहार अर्थात वस्तु भाव सब दिन सबेरे विष्णी गोठ (गुहाली) से खोहल ल्या और जंगल चरवे ज्या । येते घरमे उनकर घरवाली सबेरे से ल्याके दोपहर तक गोवर गस्तर फेकते दिन बित ज्या एवं रितसे जीवन गुजारा चैल रहल छ्याल । त कोनो आदमी के जिन्दगी एके किसिम से चललके चलल कैनेसे उ जिन्दगी से अगाया जाइछै । त एक दिन वहया विषयमे साफूके श्रीमान/श्रीमतीमे मत मत्तान्तर भाग्याल और राइत बितल सबेर भेल त विष्णी मालजाल खोहल लेलक और जंगल तरफ चैल ग्याल एते उनकर श्रीमती के मुखसे अचानक निकैल गेल से "जो बुह्रवा बोलभे बाघ भेटियो" बस वहया दिनसे विष्णी माइझ घुहरके नै ययाल त एते घरमे विष्णी माइझके घरवाली अहर ताके पहर ताके विष्णी नै ययाल दिन बितल, हप्ता बितल, महिनौं बित ग्याल त नदान दियोर, या भौजाई मात्रै त जगहमै नै रहे सक्ल त ऊ ठामसे वसाई सैरके दोसर जगह हालके सप्तरी जिल्ला के बनैलामे ययाल उ समयमे वसाई सरैवालाके भाइग ग्याल और वासाई सरैके आवेवालाके भाइगके ययाल कहे यद्यपि थारु भाषा के बोलचालमे अधुनो तक वसाई सैरके आवेवाला ज्यालाके वसाई सराइके भाइगके ययाल ग्याल कहै छै, वहनड जाब दुनो दियोर भौजाई वसाई सैरके हालके बनैला ग्याल त बनैलाके वासी सब भाइगके ययाल कहलाके सङसङै उते से ययाल रहे होठनाक नाम जोर के कहै जे चल थारु भाषाकके बोलचालमे अखनोतक छैबे करै, त उ सबके रौता से भाइगके ययाल कहे एवं रित से समय बितल गेल किष्णी सियान भेल शादी विवाह भ्याल सन्तान दर सन्तान भेल त रौता से भाइगके एल कहवेला शब्द अपभ्रमस अथवा एके ठाम जाइ्रके रौताभागी कहलावे लागल, वहया विष्णी के भाइ किष्णी के सन्तान के रौताभागी कहलावे लागल ।
और विष्णी के भाइ किष्णी सन्तान दर सन्तान फैल गेल नातीपोता भ्याल त बालबच्चा सब सन्तान सब अनेक सिमके रोग व्याधसे ग्रसित रहे लागल त एक दिन वृद्ध भाग्याल किष्णीकके शरीरमे बघेश्वरी सहित विष्णी माइझ प्रगट भेल और र कहे लागल ।
विष्णी माइझ जब उ दिन मालजाल ल्याके जंगल गयाल त वते सच्चैके बाघ सङे जम्काभेट भ्याल त बाघ वकरा ख्या खोजे त विष्णी माइझ गुणी, दिव्य पुरुष और शक्तिशाली वलिष्ठ पुरुष रहे त गुन से बाघके सालक बाघ भी देवरुपी रहे त बाघ विष्णीके छोइरके ज्या लागल त विष्णी माइझ बाघके साइ्रके बाघ सहित अलपित भया ग्याल हमरा सबमे अखुनोतक मान्यता छै विष्णी माइझ बघेश्वरीमे सवार भयाके अखनोतक रौताभागी वंशके सायसाये सम्पूर्ण मानव जाती के देवेश बैन रक्षा खैर एल छै । और किष्णी माइझके शरीरमे प्रगटभेल विष्णी माइझ बतैलक की हमरा पुजापाठ धुप-धुमन कर सब दुःख हैट जैतौ और रौताभागी के सन्तान सब पूजा पाठ, धुप-धुमन कैलक त सम्पूर्ण दुःख कष्ट हेट गेल । वहयान्तासे विष्णी माइझके पुजा आजा करे लागल कालान्तरमे सम्पूर्ण रौताभागी वंशके वंशजसब पुरखा माइझने पुज्न रहल छै । अखनोतक मान्यता छै की घर परिवारमे डाक्टर के समझके वहारके वरविमारी हेलासे आपेके पुरखाके पुजाआजा, साँझ बत्ती देलासे सम्पूर्ण दुःख कष्ट हैट जाइछै । और रौताभागी वंशके वंशजसब विष्णी माइझ बघेश्वरीके सङसङै किष्णी ओके पुजै छै कियाकी ओकरे सन्तान सब रौताभागी छियै जकरा रौताभागी सब पुर्खा के नाम लेत "किष्णी-विष्णी" गर्व पूर्वक कहै छै ।
राजकुमार रौताभागी
( अध्यक्ष )
थारु रौताभागी वंश केन्द्रीय कार्यसमिति
कानेपोखरी-५, भौसावारी मोरंग